मैं निपढ मुर्ख बाल ब्रह्मचारी
हर शाम जब भी मैं छत पे टहलने जाता
उसे सामने की छत पे मटकते पाता
कभी शर्मा के देखती, कभी देख के शर्माती
किताब लिए मुझे देख हमेशा कुछ रटती रहती |
मैं था निपढ मुर्ख बाल ब्रह्मचारी
वो कहाँ कोई साधारण नारी
लड़की देख तो मुझे आये पसीना
मोहल्ले की कोई छोरी हो या करीना कटरीना |
पागल होकर मेरे प्रेम में
फिट किये बैठी थी मुझे आँखों के फ्रेम में
मुझे तो कबड्डी तक आती न थी
और खींच रही थी ओलम्पिक के गेम में !
मन ही मन मै भी उसपे मरता था
पर आते देख घबरा के राह बदल लिया करता था
एक दिन बोली रोक के मुझे बीच बाज़ार में
तुझमे कुछ कमी है या कमी है मेरे प्यार में ?
क्या कहूँ लड़की थी या परी
पर मुझ पे थी क्यों मिट - मरी
आखिर मैंने था क्या किया
जो मानने लगी थी पिया ?
अब तो आईने में जोश से बांहे फुलाता
पर छत पे जाते हीं फिर बिल्ली बन जाता
हो सकता सब अगर बस जोश से
तो गधे जीत कर निकलते घोड़ो की रेस से |
एक दिन हिम्मत करके मैंने भी किये इशारे
पर हम तो नौसिखिये थे इस खेल में प्यारे
पता नहीं क्या खोट हो गई
वो हंस हंस के लोट पोट हो गई |
वो बेचारी कितनी तड़पती, कितनी रोती थी
पर सामने जाने की मेरी हिम्मत ही न होती थी
कितने महीने खुद को वो ऐसे ही तडपाती
अब तो पेड़ पर रहती कबूतरनी भी बन गई थी दादी |
राखी के दिन जाने क्यों गुस्सा थी अम्मा
तुझसे कोई मिलने आया है नालायक निक्कमा
मेरी तो पतलून उतर गई थी
राखी का थाल लिए वो सामने खड़ी थी !
एक टक देखी मुझे गौर से
अह फिर बाँध दी राखी जोर से
आखिर उसे क्यों ना लगती मिर्ची
पिताजी उसके बन सकते थे ससुरजी |
रोज़ उसे छुप छुप देखा करता हूँ
उस दिन को याद करके आंहे भरता हूँ
वो भी इशारे करती है
मुझ पे नहीं मेरे बाजू वाले पर मरती है !!
Written in 2012.