हर रोज़ मेरे भीतर
मर के जीने की कोशिश कर रहा जो जी के न जी सका कभी / फ़िर भी स्वार्थ की नई कीमत खोजता एक खोज मेरे भीतर
मर के जीने की कोशिश कर रहा जो जी के न जी सका कभी / फ़िर भी स्वार्थ की नई कीमत खोजता एक खोज मेरे भीतर
न्याय का बना बैठा रक्षक वही है जो / ख़ुद सर उठाने के काबिल नही है
कुछ अधुरे सपने ,मेरी मुश्किलें ,मेरी कठनाई थी, / मैं अकेला कब था ,मैं था और मेरी तनहाई थी ।
पानी के कुछ बुलबुलों में दुनिया जहान को डूबते देखा है, / सभ्यता की नई गलियों में इन्सान को मिटते देखा है,
तेरी बेवफाई से बिखर गया मैं हज़ार टुकड़ो में , / जिस टुकड़े में मेरा दिल था वो टुकड़ा आज भी ढूंढता हूँ,
पुराने रिश्तों को तोड़ कर नए बनाए नही जाते / और झूट की बुनियाद के महल होते है रेत के
आए थे जहाँ से जाना वही है , सफर है लम्बा सुहाना नहीं है / दो बातें हमसे भी कीजिए , यहाँ कोई बेगाना नहीं है ।
पास है हम सभी फिर भी दिलो से कितने दूर है, / स्वतंत्रता की लम्बी उड़ान भरते हैं,
आगे बढ़ पथिक तेरी रौशन है राहें , / दूर कहीं बुला रहीं है फ़िर वही बाहें ,
कि हम तो बहार को बाहर बंद करके रखते है / जान जाएगी पर कोई जान नही पाएगा