ज़ज़बात की निलामी

कल तुम भी ज़रुर आना निलामी होगी मेरे ज़ज़बात की,
सरे बाज़ार किमत लगेगी मेरे हालात की,
बाँध खड़ा किया जाएगा मुझे चौराहे पर,
सबकी निगाहें होंगी मेरे निगाहों पर,
सावन में पूछ क्या हो आसुओ की बरसात की,
कल तुम भी ज़रुर आना निलामी होगी मेरे ज़ज़बात की ।
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इन्सानो ने बनने दिया इन्सान तो क्या,
खुद अपने हीं घर में बन गए मेहमान तो क्या,
दिल में दर्द और होठों पर मुस्कान नहीं,
खुद पर शर्मींदा हूँ औरो से परेशान नहीं,
मुझे समझ हीं ना थी दुनिया के इस खुराफ़ात की,
कल तुम भी ज़रुर आना निलामी होगी मेरे ज़ज़बात की ।

Written in 2007.

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