नव योवना
दिल दुर हुवा , तीर पार लगे,
मन मज़बूर हूआ वह यार लगे,
सज सँवर जब सलोनी सज़नी चले
शूल बन फूल पग धूल गिरे,
कोई कैसे कुछ कहे उससे,
देखते हीं रह जाए आँख खुले और मुँह फटे
.
इस कलि कली के कान्ती काया से,
नर खो विवेक विस्मित बेसुध पड़े,
झील झलक नयन नीर भरे,
डोले नर , डूबे ना तरे,
लाल लबो ने लील लिया सब सोम रस,
नाच नशे में नर नरक गिरे,
बहे बहार बस बात से उसके,
गंगा गगरिया गम गमन करे
.
हरा ह्रिदय हाय हिरनी ने,
हिला हिमालय हार गया जपे हरे हरे,
रुप रस से राही राह भटके,
रोग ऋतु रत सारी रात जगे,
प्रेम प्रकाश बन प्रहरी आठ पहर पाठ करे,
पल में पागल हो पण्डित,
फिर भी पुलकित का प्रताप बढे !!!
Written in 2007.