मैं चाटवाला

अपनी ठेला गाडी लाकर लगा देता हूँ |
लोग आते है और मेरे बनाए स्वादिस्ट चाट का चटकारा लगाकर चले जाते
मैं भी औरो की तरह एक मामूली चाटवाला होता
अगर एक दिन वो ना आती
जाने वो कौन थी ,ना जाने क्या नाम था उसका
पहले दिन हीं बस देखते रह गए थे उसे
उसके चहरे पर उठता खट्टा मीठा भाव
जैसे एक लहर सी उठती थी
और मेरे दिल से जो कि अब तक पत्थर का था
टकरा कर मिटटी सा किये जाती थी |
चाहे इसे खुद कि तारीफ़ कहें या जो भी
मेरे हाथ का चाट खाने के बाद हर कोई दुबारा आता है ज़रूर
वो भी अक्सर आती और सिर्फ मेरे ठेले पर हीं आती
मैं जो दूसरों के जीवन में रस भरा करता था
कोई मेरी भी जिंदगी में रस भरने लगा था
बड़ा अफ़सोस हुआ था मुझे जब दसवीं पास करके भी
चाट बेचना शुरू करना पड़ा था मुझे
पर अब तो जिस नज़र से देखती
मुझे खुद पे गर्व होने लगा था
हाय वो खाते खाते कैसे लजा जाती थी
हाँ पर जाते जाते अपनी हंसी जरुर छोड़ जाती थी
क्या क्या सपने देखने लगा था मैं उसके बारे में
मैं खुद सोच के शर्मा जाता हूँ |
एक दिन उसे मिर्ची लगी ,बोली भैया पानी दीजिये
मिर्ची उसे क्या ,मिर्ची तो मुझे लगी और बहुत तेज़ लगी
ये दिल जो पत्थर से मिटटी का हो चला था
एक झटके में हीं टूट गया और टूट गया ये भ्रम
कि मैं भी कोई दिलवाला हूँ
भूल गया था , मैं तो एक मामूली चाटवाला हूँ
पर इस मिर्ची ने मुझे जीना सिखा दिया
अब मैं दिल टूटने का इंतज़ार नहीं करता
खुद हीं दिल तोड़ लेता हूँ
किसी सुंदरी के आते हीं डाल के ज्यादा मिर्ची
निगाहें फेर लेता हूँ |

Written in 2011.

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