प्यार का बलिदान

छू कर तेरे गालों को ,क्या मिला मुझे इनकी कोमलता छीन कर
बिखरा के कजरा आंसुओ से अब इन्हें और न मलिन कर
हर सदमे से उबर जाऊँगा ,सदा की तरह मेरा आज भी यकीन कर |
अपनी खुशियों का बलिदान देकर ,मात-पिता को खुश करने चली है
जीवन जितना जटिल है, उतनी ही तू भोली पगली है
इस वियोग में कितना तड़प रही है तू ,मेरे प्यार में भी जली है |
छीन कर स्वयं को मुझसे ,अपने आप से ही रूठी है
मुझसे बिछड़ने का अब गम नहीं ,तेरी बातें तेरी हंसी जितनी झूठी है
तू निकल गई है प्रीत की जाल से ,उंगली में फंस गई मेरी अंगूठी है !!

Written in 2012.

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