ज़ज़बात की निलामी
कल तुम भी ज़रुर आना निलामी होगी मेरे ज़ज़बात की, / सरे बाज़ार किमत लगेगी मेरे हालात की,
Hindi poems by Nishikant Tiwari.
कल तुम भी ज़रुर आना निलामी होगी मेरे ज़ज़बात की, / सरे बाज़ार किमत लगेगी मेरे हालात की,
डुबते को तिनके का सहारा होता, / दुनिया की इस भीड़ में कोइ तो हमारा होता,
पास है हम सभी फिर भी दिलो से कितने दूर है, / स्वतंत्रता की लम्बी उड़ान भरते हैं,
प्यार करता हूँ तुम्हे मेरी कमज़ोरी है, / पर क्या करूँ जीने के लिए ज़रुरी है,
आगे बढ़ पथिक तेरी रौशन है राहें , / दूर कहीं बुला रहीं है फ़िर वही बाहें ,
उसके कदमों पे गिर जाता मैं इतना भी मज़बूर न था / चाहता था बहुत उसे पर ये मेरे दिल को मंज़ूर ना था
कि हम तो बहार को बाहर बंद करके रखते है / जान जाएगी पर कोई जान नही पाएगा
ये जो पर्दा है बेदर्दी जान ले लेगा, / मैं प्यार करता हूँ उससे यह बात मेरे सिवा कोई जानता नहीं,
रात बहुत हो चुकी है, / पर आँखो में नींद नहीं है,
कहीं ना कहीं एक और मैं हूँ, / चाहे इस जहाँ में या उस जहाँ में,