आओ सखी साथ एक शाम गुजारे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे / हरे नरम घास पर बैठे डूबते सूरज को देखे
आओ सखी साथ एक शाम गुजारे / हरे नरम घास पर बैठे डूबते सूरज को देखे
उसकी आँखों में कितना प्यार कितनी सच्चाई दिखती / मेरी कितनी चिंता थी, कितना ख्याल रखती
लहराती हो जब आँचल तो पेड़ झूमते हैं / छुप छुप के देखते हम पेड़ो को चूमते हैं
रूठी तो कई बार थी मुझसे , / पर इतना दर्द तो ना होता था ,
छू कर तेरे गालों को ,क्या मिला मुझे इनकी कोमलता छीन कर / बिखरा के कजरा आंसुओ से अब इन्हें और न मलिन कर
जब याद करके तेरा उदास मुखड़ा हृदय फटने लगता है / और अपनी रिश्ते की अनिश्चिताओं में मन भटकने लगता है
कितना भी यत्न कर लूं / टीस है जो कम होती नहीं है
अपनी ठेला गाडी लाकर लगा देता हूँ | / लोग आते है और मेरे बनाए स्वादिस्ट चाट का चटकारा लगाकर चले जाते
थकी हारी दीवारों के उपर एक गीली गीली छत है / हर शाम वही बैठ कर आँखे भिजाने की लत है
इन आँखों के सैलाब से दो बूंद पानी मांग लेते / तुम्हे हक़ था मेरी जवानी मांग लेते